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महानायक अमिताभ बच्चन का संपूर्ण जीवन परिचय (Biography of Amitabh Bachchan in Hindi)

अमिताभ बच्चन: सदी के महानायक का संपूर्ण और विस्तृत जीवन परिचय

भारतीय सिनेमा के इतिहास में अगर किसी एक व्यक्ति का नाम सबसे सुनहरे अक्षरों में लिखा जाए, तो वह निश्चित रूप से अमिताभ बच्चन का होगा। अमिताभ बच्चन केवल एक नाम या एक अभिनेता नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय सिनेमा का एक पूरा युग हैं। उनकी भारी आवाज़, उनकी छह फीट दो इंच की लंबी कद-काठी, उनकी आँखों की गहराई और उनके अभिनय की बहुमुखी प्रतिभा ने उन्हें ‘सदी का महानायक’, ‘बिग बी’, ‘शहंशाह’ और ‘एंग्री यंग मैन’ जैसे अनगिनत खिताब दिलाए हैं।

अमिताभ बच्चन की जीवन यात्रा केवल चकाचौंध और सफलता की कहानी नहीं है। यह कहानी है अथाह संघर्ष की, लगातार 12 फ्लॉप फिल्में देने के बाद रातों-रात स्टार बनने की, मौत के मुंह से वापस लौटकर आने की, राजनीति के दलदल में फंसने की, आर्थिक रूप से पूरी तरह दिवालिया हो जाने की और फिर राख से उठकर फीनिक्स पक्षी की तरह दोबारा आसमान छूने की।


पारिवारिक पृष्ठभूमि और जन्म

अमिताभ बच्चन का जन्म 11 अक्टूबर 1942 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम डॉ. हरिवंश राय बच्चन था, जो हिंदी साहित्य की छायावादी और हालावादी कविता के एक बहुत बड़े और प्रसिद्ध कवि थे। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना ‘मधुशाला’ आज भी साहित्य प्रेमियों की जुबान पर रहती है। अमिताभ की माता का नाम तेजी बच्चन था, जो एक सिख परिवार से ताल्लुक रखती थीं और रंगमंच (थिएटर) में गहरी रुचि रखती थीं। तेजी बच्चन का स्वभाव बहुत ही अनुशासित और कलात्मक था, जिसका गहरा प्रभाव अमिताभ के व्यक्तित्व पर पड़ा।

जन्म के समय भारत में स्वतंत्रता संग्राम जोरों पर था। उस समय उनके पिता ने उनका नाम ‘इंकलाब’ रखा था, जो ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे से प्रेरित था। लेकिन बाद में, हरिवंश राय बच्चन के करीबी मित्र और हिंदी के एक अन्य महान कवि सुमित्रानंदन पंत ने सुझाव दिया कि इस बालक का नाम ‘अमिताभ’ रखा जाए। अमिताभ का अर्थ होता है— ‘वह प्रकाश जो कभी बुझता नहीं है’ या ‘असीमित आभा वाला’।

अमिताभ के एक छोटे भाई भी हैं, जिनका नाम अजिताभ बच्चन है। शुरुआत में बच्चन परिवार का उपनाम ‘श्रीवास्तव’ था, लेकिन हरिवंश राय बच्चन ने जाति व्यवस्था का विरोध करते हुए अपना उपनाम ‘बच्चन’ (जिसका अर्थ ‘बच्चा’ होता है) रख लिया था। जब अमिताभ का स्कूल में दाखिला कराया जाना था, तब उनके पिता ने आधिकारिक रूप से उनके नाम के आगे ‘बच्चन’ उपनाम ही लिखवाया और इस तरह यह उनका पारिवारिक उपनाम बन गया।


प्रारंभिक शिक्षा और स्कूल का जीवन

अमिताभ बच्चन की प्रारंभिक शिक्षा प्रयागराज (इलाहाबाद) के ज्ञान प्रबोधिनी और बॉयज हाई स्कूल से हुई। बचपन से ही अमिताभ बहुत शर्मीले और अंतर्मुखी स्वभाव के थे। उन्हें नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने का शौक था, जिसकी प्रेरणा उन्हें अपनी मां तेजी बच्चन से मिली थी।

इलाहाबाद में कुछ साल बिताने के बाद, उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए नैनीताल के प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित बोर्डिंग स्कूल ‘शेरवुड कॉलेज’ (Sherwood College) भेज दिया गया। शेरवुड कॉलेज में रहते हुए अमिताभ ने अपनी कलात्मक प्रतिभा को और निखारा। वे स्कूल के नाटकों में भाग लेते थे और अक्सर उन्हें उनके शानदार अभिनय के लिए पुरस्कार भी मिलते थे।

शेरवुड कॉलेज से स्कूलिंग पूरी करने के बाद, अमिताभ दिल्ली आ गए। यहां उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध ‘किरोड़ीमल कॉलेज’ (Kirori Mal College) में दाखिला लिया। किरोड़ीमल कॉलेज से उन्होंने विज्ञान (B.Sc) और बाद में कला (Arts) में अपनी स्नातक की डिग्री पूरी की। दिल्ली में रहते हुए भी वे कॉलेज के थिएटर ग्रुप से जुड़े रहे और कई नाटकों में अपने अभिनय का प्रदर्शन किया।


कलकत्ता का सफर और नौकरी के दिन

स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अमिताभ के सामने करियर चुनने का सवाल था। उनके पिता चाहते थे कि वे अच्छी नौकरी करें। इसी तलाश में अमिताभ कलकत्ता (अब कोलकाता) चले गए। 1960 के दशक में कलकत्ता भारत का एक बहुत बड़ा औद्योगिक और व्यावसायिक केंद्र था।

कलकत्ता में अमिताभ ने एक शिपिंग और ब्रोकिंग फर्म ‘बर्ड एंड कंपनी’ (Bird & Co.) और बाद में ‘ब्लैकर एंड कंपनी’ (Blacker & Co.) में एक कार्यकारी (एक्जीक्यूटिव) के रूप में काम करना शुरू किया। उनकी पहली तनख्वाह लगभग 500 रुपये थी, जो उस समय एक अच्छी रकम मानी जाती थी। कलकत्ता में उन्होंने लगभग सात साल बिताए। इस दौरान वे अपने दोस्तों के साथ नाटकों में हिस्सा लेते थे और अक्सर हॉलीवुड की फिल्में देखने जाया करते थे।

लेकिन ऑफिस की वह चारदीवारी और फाइलों का काम अमिताभ को कभी रास नहीं आया। उनके अंदर का कलाकार हमेशा बेचैन रहता था। उन्हें अपनी भारी और आकर्षक आवाज़ पर बहुत भरोसा था। उन्होंने ‘ऑल इंडिया रेडियो’ (All India Radio) में एक न्यूज़ एनाउंसर (समाचार वाचक) के पद के लिए ऑडिशन भी दिया, लेकिन विडंबना देखिए कि जिस आवाज़ का आज पूरी दुनिया लोहा मानती है, उसी आवाज़ को ऑल इंडिया रेडियो ने यह कहकर खारिज कर दिया कि यह आवाज़ रेडियो के लिए उपयुक्त नहीं है।


सपनों की नगरी बंबई (मुंबई) का रुख और कड़ा संघर्ष

नौकरी से असंतुष्ट अमिताभ ने 1968 में अपनी नौकरी छोड़ दी और फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने के लिए बंबई (अब मुंबई) का रुख किया। उस समय बंबई आना और फिल्मों में काम मांगना आसान नहीं था।

अमिताभ का शुरुआती संघर्ष बहुत ही कठिन था। उनके पास रहने के लिए कोई स्थायी जगह नहीं थी। कई बार उन्होंने ‘मरीन ड्राइव’ के किनारे बेंच पर सोकर रातें बिताईं। फिल्म स्टूडियो के चक्कर लगाते हुए उन्हें हर जगह से निराशा ही हाथ लगती थी। उस दौर में राजेश खन्ना, देव आनंद और शम्मी कपूर जैसे चॉकलेटी और रोमांटिक चेहरों का बोलबाला था। अमिताभ बहुत दुबले-पतले थे और उनकी लंबाई बहुत ज्यादा थी। कई निर्माताओं ने उन्हें यह कहकर वापस कर दिया कि वे एक ‘ऊंट’ की तरह दिखते हैं और उनकी लंबाई किसी भी अभिनेत्री के साथ मेल नहीं खाएगी।

इस संघर्ष के दौर में प्रसिद्ध हास्य अभिनेता महमूद ने अमिताभ की बहुत मदद की। महमूद ने अमिताभ की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपने घर में रहने की जगह दी। महमूद के भाई अनवर अली अमिताभ के बहुत अच्छे दोस्त बन गए।


सिनेमा में पहला कदम और असफलता का दौर

लंबे संघर्ष के बाद, 1969 में ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ से अमिताभ को बतौर अभिनेता अपना पहला ब्रेक मिला। यह फिल्म गोवा की आज़ादी के संघर्ष पर आधारित थी। इस फिल्म में अमिताभ ने एक मुस्लिम युवक का किरदार निभाया था। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई खास कमाल नहीं कर पाई, लेकिन अमिताभ के अभिनय को सराहा गया और उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ नवोदित अभिनेता’ का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

इसके बाद उन्होंने 1969 में ही मृणाल सेन की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता बंगाली फिल्म ‘भुवन शोम’ में अपनी आवाज़ दी (वॉयस नैरेटर के रूप में)। 1971 में ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘आनंद’ आई, जिसमें सुपरस्टार राजेश खन्ना मुख्य भूमिका में थे। अमिताभ ने इस फिल्म में ‘डॉक्टर भास्कर बनर्जी’ (बाबू मोशाय) का किरदार निभाया। फिल्म सुपरहिट रही और अमिताभ को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।

लेकिन ‘आनंद’ की सफलता के बाद भी अमिताभ का करियर पटरी पर नहीं आया। उन्होंने ‘परवाना’ (जिसमें उन्होंने विलेन का रोल किया), ‘प्यार की कहानी’, ‘रेशमा और शेरा’, ‘बॉम्बे टू गोवा’, ‘बंसी बिरजू’, ‘एक नज़र’ और ‘रास्ते का पत्थर’ जैसी कई फिल्में कीं। 1969 से लेकर 1973 तक उन्होंने लगातार 12 फ्लॉप फिल्में दीं। इंडस्ट्री में उन्हें ‘मनहूस’ कहा जाने लगा। कई निर्माताओं ने उन्हें अपनी फिल्मों से निकाल दिया। अमिताभ पूरी तरह टूट चुके थे और वापस इलाहाबाद लौटने का मन बना चुके थे।


‘जंजीर’ और ‘एंग्री यंग मैन’ का उदय (1973)

अमिताभ के करियर और भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट 1973 में आया, जब प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘ज़ंजीर’ रिलीज़ हुई। इस फिल्म की कहानी मशहूर लेखक जोड़ी सलीम-जावेद ने लिखी थी।

दिलचस्प बात यह है कि ‘जंजीर’ के इंस्पेक्टर विजय के रोल के लिए अमिताभ पहली पसंद नहीं थे। प्रकाश मेहरा इस रोल को लेकर देव आनंद, राज कुमार और धर्मेंद्र जैसे बड़े सुपरस्टार्स के पास गए थे, लेकिन सभी ने किसी न किसी कारण से इस फिल्म को ठुकरा दिया। तब सलीम-जावेद ने प्रकाश मेहरा को ‘बॉम्बे टू गोवा’ फिल्म का एक फाइट सीन दिखाया और कहा कि इस लंबे लड़के (अमिताभ) में वो गुस्सा और वो आग है जो ‘विजय’ के किरदार के लिए चाहिए।

अमिताभ को ‘जंजीर’ मिली। इस फिल्म में उन्होंने सिस्टम से लड़ते हुए, अपनी भावनाओं को दबाकर रखने वाले और अपराध के खिलाफ आग उगलने वाले एक ऐसे पुलिस इंस्पेक्टर का किरदार निभाया, जिसने पर्दे पर ‘रोमांटिक हीरो’ की छवि को पूरी तरह खत्म कर दिया। ‘ज़ंजीर’ बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई। इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को ‘एंग्री यंग मैन’ (Angry Young Man) दिया और अमिताभ बच्चन रातों-रात सुपरस्टार बन गए।


1970 और 1980 का दशक: बॉक्स ऑफिस के निर्विवाद ‘शहंशाह’

‘जंजीर’ के बाद अमिताभ ने सफलता की ऐसी उड़ान भरी, जो आज तक एक मिसाल है। 1970 और 80 के दशक में बॉक्स ऑफिस पर केवल एक ही नाम चलता था— अमिताभ बच्चन। इस दौरान उन्होंने हर विधा (Genre) की फिल्में कीं— चाहे वह एक्शन हो, कॉमेडी हो, ड्रामा हो या रोमांस।

उनके करियर की कुछ सबसे महान और ब्लॉकबस्टर फिल्में इस प्रकार रहीं:

फ्रांस के मशहूर फिल्म निर्देशक फ्रांस्वा त्रुफो ने अमिताभ को ‘वन मैन इंडस्ट्री’ (One Man Industry) का नाम दिया था, क्योंकि वे अकेले ही अपने दम पर फिल्मों को सुपरहिट कराने की गारंटी बन चुके थे।


1982 का ‘कुली’ हादसा: जब मौत को दी मात

अमिताभ बच्चन के जीवन का सबसे भयानक अध्याय 26 जुलाई 1982 को शुरू हुआ। बेंगलुरु विश्वविद्यालय के परिसर में मनमोहन देसाई की फिल्म ‘कुली’ की शूटिंग चल रही थी। एक एक्शन सीन में अमिताभ को सह-अभिनेता पुनीत इस्सर के साथ लड़ना था और एक मेज के ऊपर गिरना था।

सीन के दौरान अमिताभ मेज के कोने से बुरी तरह टकराए। वह चोट बाहर से नहीं दिख रही थी, लेकिन उनकी आंतें (Intestines) फट गई थीं और अंदरूनी खून बहना शुरू हो गया था। शुरुआत में इसे मामूली चोट समझा गया, लेकिन जल्द ही उनकी हालत बिगड़ने लगी। उन्हें तुरंत मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल लाया गया।

उनकी हालत इतनी नाजुक थी कि कई दिनों तक वे कोमा में रहे। डॉक्टरों ने एक बार उन्हें ‘क्लीनिकली डेड’ (Clinically Dead) तक घोषित कर दिया था, लेकिन एड्रेनालाईन के इंजेक्शन और कई घंटों की सर्जरी के बाद उनकी सांसें लौट आईं।

उस समय पूरा देश अमिताभ के लिए दुआएं कर रहा था। लोग मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और चर्चों में उनके लिए प्रार्थना कर रहे थे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद उन्हें देखने अस्पताल पहुंची थीं। यह भारत के इतिहास की उन दुर्लभ घटनाओं में से एक है जब किसी अभिनेता के लिए पूरा देश एक साथ रोया और दुआएं मांगी। महीनों अस्पताल में रहने के बाद अमिताभ ने मौत को मात दी और वे ठीक होकर घर लौटे।


राजनीति में प्रवेश और कटु अनुभव

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, उनके बेटे और अमिताभ के बचपन के दोस्त राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने। राजीव गांधी के विशेष अनुरोध पर अमिताभ ने कुछ समय के लिए फिल्मों से ब्रेक लिया और राजनीति में प्रवेश किया।

1984 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने अपने गृह नगर इलाहाबाद (प्रयागराज) से उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज राजनेता हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ चुनाव लड़ा। अमिताभ ने भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी जीतों में से एक दर्ज की और 68.2% वोटों के भारी अंतर से चुनाव जीत लिया।

लेकिन राजनीति का उनका अनुभव बहुत ही कड़वा रहा। कुछ ही समय बाद, ‘बोफोर्स घोटाले’ में उनका और उनके भाई अजिताभ का नाम घसीटा गया। हालांकि बाद में भारतीय अदालतों और स्वीडिश पुलिस ने उन्हें इस मामले में पूरी तरह से क्लीन चिट दे दी थी, लेकिन इस झूठे आरोप से अमिताभ इतने आहत हुए कि उन्होंने तीन साल के भीतर ही संसद सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। राजनीति छोड़ने के बाद उन्होंने इसे ‘एक गंदा नाबदान’ (Cesspool) करार दिया और कसम खाई कि वे दोबारा कभी राजनीति में कदम नहीं रखेंगे।


वापसी, ABCL की स्थापना और आर्थिक दिवालियापन

1988 में ‘शहंशाह’ फिल्म से उन्होंने फिल्मों में वापसी की। यह फिल्म हिट रही। इसके बाद ‘हम’ (1991), ‘अग्निपथ’ (1990) और ‘खुदा गवाह’ (1992) जैसी फिल्मों में उनके काम की खूब सराहना हुई। ‘अग्निपथ’ में विजय दीनानाथ चौहान के उनके आइकॉनिक किरदार के लिए उन्हें अपना पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) मिला।

1992 के बाद उन्होंने पांच साल का ब्रेक लिया और व्यवसाय की दुनिया में कदम रखा। 1996 में उन्होंने ‘अमिताभ बच्चन कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ (ABCL) नाम की एक मीडिया और मनोरंजन कंपनी की स्थापना की। इस कंपनी का उद्देश्य फिल्म उत्पादन, वितरण, ऑडियो कैसेट और इवेंट मैनेजमेंट करना था।

1996 में ABCL ने भारत में ‘मिस वर्ल्ड’ प्रतियोगिता का भव्य आयोजन किया। लेकिन खराब प्रबंधन और व्यावसायिक अनुभव की कमी के कारण कंपनी भारी घाटे में चली गई। 1999 आते-आते ABCL पूरी तरह से दिवालिया हो गई। अमिताभ बच्चन पर लगभग 90 करोड़ रुपये का भारी कर्ज हो गया।

यह उनके जीवन का सबसे अंधकारमय दौर था। लेनदार रोज उनके घर के बाहर आकर गालियां देते और पैसे मांगते। उनके पास अपने स्टाफ को सैलरी देने तक के पैसे नहीं थे। यहां तक कि उनका प्रसिद्ध बंगला ‘प्रतीक्षा’ भी केनरा बैंक के पास गिरवी रखा जा चुका था। उनकी फिल्में ‘मृत्युदाता’, ‘लाल बादशाह’ और ‘सूर्यवंशम’ बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हो रही थीं।


राख से दोबारा उठना: ‘मोहब्बतें’ और KBC का जादू

जब हर तरफ से रास्ते बंद नजर आने लगे, तब अमिताभ ने अपने अहंकार को किनारे रखा और काम मांगने के लिए अपने पुराने दोस्त और प्रसिद्ध फिल्म निर्माता यश चोपड़ा के घर पहुंच गए। उन्होंने यश चोपड़ा से कहा कि उनके पास कोई काम नहीं है और उन पर बहुत कर्ज है। यश चोपड़ा ने उन्हें अपनी अगली फिल्म ‘मोहब्बतें’ (2000) में ‘नारायण शंकर’ का एक बेहद सख्त और अनुशासित गुरुकुल प्रिंसिपल का रोल दिया। फिल्म सुपरहिट रही और अमिताभ ने एक चरित्र अभिनेता के रूप में अपनी दूसरी पारी की शानदार शुरुआत की।

उसी वर्ष (2000), स्टार प्लस (Star Plus) ने भारतीय टेलीविजन के इतिहास का सबसे बड़ा दांव खेला। उन्होंने अमिताभ बच्चन को टेलीविजन गेम शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (KBC) का होस्ट बनने का प्रस्ताव दिया। उस समय किसी भी बड़े फिल्म स्टार का टेलीविजन पर आना करियर की गिरावट माना जाता था। उनकी पत्नी जया बच्चन और अन्य शुभचिंतकों ने उन्हें टीवी न करने की सलाह दी। लेकिन पैसों की सख्त जरूरत और कुछ नया करने की चाह में अमिताभ ने वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

‘कौन बनेगा करोड़पति’ ने इतिहास रच दिया। अमिताभ की जादुई आवाज़, उनके बात करने का विनम्र तरीका, उनकी शुद्ध हिंदी और आम आदमी के साथ उनका जुड़ाव दर्शकों को इतना पसंद आया कि भारत की सड़कें रात 9 बजे सूनी हो जाया करती थीं। KBC की अभूतपूर्व सफलता ने न केवल स्टार प्लस को नंबर वन चैनल बना दिया, बल्कि अमिताभ बच्चन को उनके सारे कर्ज चुकाने और अपनी प्रतिष्ठा वापस पाने में भी मदद की। इस शो के माध्यम से वे ‘एंग्री यंग मैन’ से भारत के ‘अंकल’ और ‘पितामह’ बन गए।


सिनेमा में दूसरी पारी: उम्र के हर पड़ाव पर नए प्रयोग (2000 के दशक से वर्तमान तक)

KBC और मोहब्बतें के बाद अमिताभ ने फिल्मों की झड़ी लगा दी। उन्होंने अपनी उम्र के अनुसार भूमिकाएं चुननी शुरू कीं और साबित कर दिया कि 60 वर्ष की उम्र के बाद भी कोई अभिनेता फिल्म का मुख्य आकर्षण हो सकता है।

इस दौरान उन्होंने कई बेहतरीन फिल्में कीं:


निजी जीवन: विवाह, परिवार और विवाद

अमिताभ बच्चन के निजी जीवन की बात करें तो 3 जून 1973 को उन्होंने प्रसिद्ध और प्रतिभाशाली अभिनेत्री जया भादुड़ी (Jaya Bachchan) से एक सादे समारोह में विवाह किया।

उनकी शादी का किस्सा बहुत ही रोचक है। फिल्म ‘ज़ंजीर’ की सफलता के बाद अमिताभ, जया और उनके कुछ दोस्त लंदन छुट्टियां मनाने जाना चाहते थे। जब अमिताभ ने अपने पिता हरिवंश राय बच्चन से अनुमति मांगी, तो पिता ने साफ कह दिया कि “अगर तुम्हें जया के साथ लंदन जाना है, तो पहले उससे शादी करनी होगी, बिना शादी के तुम दोनों साथ नहीं जा सकते।” पिता की बात मानकर दोनों ने तुरंत शादी कर ली और उसी दिन लंदन के लिए रवाना हो गए।

अमिताभ और जया के दो बच्चे हैं: बेटी श्वेता बच्चन (जिनकी शादी नंदा परिवार में हुई है) और बेटा अभिषेक बच्चन, जो खुद बॉलीवुड के एक जाने-माने अभिनेता हैं। अमिताभ की बहू पूर्व मिस वर्ल्ड और मशहूर अभिनेत्री ऐश्वर्या राय बच्चन हैं और उनकी एक पोती आराध्या बच्चन है।

अमिताभ बच्चन का नाम अक्सर उनके समय की मशहूर और खूबसूरत अभिनेत्री रेखा (Rekha) के साथ भी जोड़ा जाता रहा। ‘सिलसिला’ फिल्म के बाद उनके और रेखा के रिश्तों को लेकर भारतीय मीडिया में खूब गपशप और विवाद रहे। हालांकि अमिताभ ने हमेशा इस विषय पर सार्वजनिक रूप से एक गरिमामयी चुप्पी बनाए रखी।


स्वास्थ्य संबंधी गंभीर चुनौतियां

अमिताभ बच्चन ने अपने जीवन में सिर्फ आर्थिक और करियर से जुड़े संघर्ष ही नहीं देखे, बल्कि उन्होंने मौत को कई बार करीब से महसूस किया है। 1982 के कुली हादसे के दौरान, जब उन्हें खून चढ़ाया जा रहा था, तब किसी डोनर के खून में ‘हेपेटाइटिस बी’ (Hepatitis B) का वायरस था, जो उनके शरीर में प्रवेश कर गया। इस वायरस के कारण लगभग 20 साल बाद वर्ष 2000 में उनका लिवर बुरी तरह संक्रमित हो गया और उन्हें पता चला कि उनका 75% लिवर (यकृत) काम करना बंद कर चुका है। आज वे केवल 25% लिवर के सहारे जी रहे हैं।

इसके अलावा, 1984 में उन्हें ‘मायस्थेनिया ग्रेविस’ (Myasthenia Gravis) नाम की एक बहुत ही गंभीर ऑटोइम्यून बीमारी का पता चला था, जिसमें मांसपेशियां बहुत कमजोर हो जाती हैं और व्यक्ति अपनी शारीरिक गतिविधियों पर नियंत्रण खो देता है।

उन्हें वर्ष 2000 में टीबी (ट्यूबरकुलोसिस / तपेदिक) की बीमारी का भी सामना करना पड़ा था, जिसका उन्होंने पूरा इलाज करवाया। वे भारत में टीबी और हेपेटाइटिस बी के उन्मूलन के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय के ब्रांड एंबेसडर भी हैं। 2020 में कोरोना महामारी के दौरान भी वे कोविड-19 पॉजिटिव हो गए थे और कई दिनों तक नानावती अस्पताल में भर्ती रहे थे। लेकिन हर बार अपने अदम्य साहस, संयम और अनुशासन के बल पर वे इन सभी बीमारियों से लड़कर वापस आए हैं।


समाज सेवा और परोपकार (Philanthropy)

अमिताभ बच्चन अपने परोपकारी कार्यों और समाज सेवा के लिए भी जाने जाते हैं। उन्होंने हमेशा आगे बढ़कर देश और समाज की मदद की है, हालांकि वे अक्सर इसका प्रचार करने से बचते हैं।


प्रमुख पुरस्कार और अंतरराष्ट्रीय सम्मान

सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए अमिताभ बच्चन को अनगिनत पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। भारत सरकार और कई विदेशी सरकारों ने भी उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मानों से नवाज़ा है:

राष्ट्रीय सम्मान (भारत सरकार द्वारा):

  1. पद्म श्री: 1984 में कला के क्षेत्र में योगदान के लिए।
  2. पद्म भूषण: 2001 में।
  3. पद्म विभूषण: 2015 में (भारत का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान)।
  4. दादा साहब फाल्के पुरस्कार: 2019 में (यह भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा और सर्वोच्च सम्मान है)।

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार:

फिल्मफेयर पुरस्कार:

अमिताभ बच्चन ने अपने करियर में 15 से अधिक फिल्मफेयर पुरस्कार जीते हैं (जिसमें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता और लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड शामिल हैं)। उन्हें 40 से अधिक बार फिल्मफेयर में नामांकित किया गया है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

अंतरराष्ट्रीय सम्मान:


निष्कर्ष और विरासत

अमिताभ बच्चन महज़ एक स्टार नहीं हैं; वे एक संस्था हैं। उन्होंने अपने जीवन में वह सब कुछ देखा है जिसकी कल्पना एक आम इंसान कर सकता है— असीम शोहरत, गहरा पतन, जीवन-मरण का संघर्ष और फिर से शिखर पर पहुंचना।

80 वर्ष की उम्र पार करने के बाद भी उनका काम के प्रति समर्पण, उनकी ऊर्जा, सेट पर समय से पहले पहुंचने का उनका अनुशासन और लगातार कुछ नया सीखने की उनकी चाहत आज की युवा पीढ़ी और नए अभिनेताओं के लिए एक बहुत बड़ी पाठशाला है। वे आज भी हर दिन अपने ब्लॉग पर लिखते हैं और अपने प्रशंसकों (जिन्हें वे अपना एक्सटेंडेड परिवार या ‘EF’ कहते हैं) से जुड़े रहते हैं।

उनके पिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन की कविता की ये पंक्तियां अमिताभ बच्चन के जीवन पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं:

“लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती!”

अमिताभ बच्चन भारतीय सिनेमा के आसमान का वह ध्रुव तारा हैं, जिसकी चमक समय के साथ और भी गहरी और रोशन होती जा रही है। उनकी विरासत आने वाली कई पीढ़ियों तक भारतीय सिनेमा का मार्गदर्शन करती रहेगी।

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