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भारतीय अर्थव्यवस्था: स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर और नियोजन के युग की शुरुआत

भारतीय अर्थव्यवस्था: स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर और नियोजन के युग की शुरुआत

यह नोट्स भारतीय अर्थव्यवस्था की स्वतंत्रता-पूर्व स्थिति और स्वतंत्रता के बाद नियोजन युग की शुरुआत, उसके लक्ष्यों और विकास की रणनीतियों पर केंद्रित है।


भाग 1: स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ

स्वतंत्रता (1947) के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के लगभग 200 वर्षों के शोषणकारी प्रभाव को दर्शाती थी। इसे मुख्य रूप से एक पिछड़ी, गतिहीन और कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था के रूप में वर्णित किया जा सकता है।

मुख्य विशेषताएँ:

1. कृषि क्षेत्र में पिछड़ापन (Backwardness of Agriculture Sector):

2. औद्योगिक क्षेत्र का पतन (Deindustrialisation):

3. विदेशी व्यापार (Foreign Trade) की दिशा और संरचना:

4. जनांकिकीय स्थिति (Demographic Condition):

5. खराब आधारभूत संरचना (Poor Infrastructure):

निष्कर्ष (स्वतंत्रता के समय):

स्वतंत्रता के समय भारत एक गरीब, अल्पविकसित, और कृषि पर निर्भर अर्थव्यवस्था था, जिसका औद्योगिक आधार बहुत कमजोर था और व्यापक गरीबी और अशिक्षा थी।


भाग 2: नियोजन युग की शुरुआत (Start of Planning Era)

स्वतंत्रता के बाद, भारत के सामने एक गरीब और पिछड़ी अर्थव्यवस्था को एक आधुनिक और विकसित अर्थव्यवस्था में बदलने की एक बड़ी चुनौती थी। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, भारत ने ‘आर्थिक नियोजन’ (Economic Planning) का मार्ग चुना।

विकास के लक्ष्य (Goals of Development/Planning)

भारत की पंचवर्षीय योजनाओं के चार मुख्य दीर्घकालिक लक्ष्य थे:

1. संवृद्धि (Growth):

2. आधुनिकीकरण (Modernisation):

3. आत्मनिर्भरता (Self-Reliance):

4. समानता (Equity):

विकास की रणनीतियाँ (Strategies of Development – 1950 से 1990 तक)

इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, भारत ने शुरुआती चार दशकों (1950-1990) में एक विशिष्ट रणनीति अपनाई:

1. सार्वजनिक क्षेत्र पर भारी निर्भरता (Heavy Reliance on Public Sector):

2. औद्योगिक विकास (Industrial Development):

3. आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution) की व्यापार नीति:

4. निजी क्षेत्र पर सख्त नियंत्रण (Strict Control on Private Sector):

5. कृषि और भूमि सुधार (Agriculture and Land Reforms):


संक्षेप में: स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था शोषणकारी ब्रिटिश नीतियों के कारण अत्यंत पिछड़ी हुई थी। इस स्थिति से उबरने के लिए भारत ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से विकास का मार्ग चुना, जिसका उद्देश्य संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता और समानता प्राप्त करना था। शुरुआती रणनीति में सार्वजनिक क्षेत्र की प्रधानता और आयात प्रतिस्थापन पर ज़ोर दिया गया था।

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