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झारखण्ड में शिक्षा व्यवस्था का अभूतपूर्व संकट: 25 हजार शिक्षकों की नौकरी पर लटकती तलवार, जेटेट (JTET) नियमावली की विसंगतियां और भविष्य का अंधकार

झारखण्ड में शिक्षा व्यवस्था का अभूतपूर्व संकट: 25 हजार शिक्षकों की नौकरी पर लटकती तलवार, जेटेट (JTET) नियमावली की विसंगतियां और भविष्य का अंधकार

जब दशकों का अनुभव नियमावली के पन्नों में उलझ जाए

किसी भी राज्य या राष्ट्र के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका सबसे अहम होती है। शिक्षक वह कुम्हार है जो कच्ची मिट्टी रूपी विद्यार्थियों को गढ़कर उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनाता है। लेकिन क्या हो जब उस कुम्हार के अस्तित्व पर ही संकट आ जाए? झारखण्ड राज्य इन दिनों एक ऐसे ही गहरे और अभूतपूर्व शैक्षिक संकट से गुजर रहा है, जहां एक-दो नहीं, बल्कि पूरे 25 हजार शिक्षकों के भविष्य और उनकी आजीविका पर तलवार लटक गई है।

हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देशों के बाद झारखण्ड के शिक्षा विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। राज्य के 25 हजार शिक्षकों की प्रशिक्षण डिग्री को वर्तमान जेटेट (Jharkhand Teacher Eligibility Test – JTET) नियमावली के अनुरूप नहीं माना जा रहा है। इसका सीधा और खौफनाक अर्थ यह है कि झारखंड एकेडमिक काउंसिल (JAC) द्वारा इन शिक्षकों के आवेदन स्वीकार नहीं किए जा रहे हैं। आदेश बिल्कुल स्पष्ट है—अगर अगले दो सालों में इन संबंधित शिक्षकों ने जेटेट की परीक्षा पास नहीं की, तो उनकी दशकों पुरानी नौकरी चली जाएगी।

यह कोई सामान्य प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों के लिए एक जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन राज्य के नौनिहालों को पढ़ाने में खपा दिया। इस पूरे मामले को गहराई से समझने के लिए हमें इसके ऐतिहासिक, कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं की चीर-फाड़ करनी होगी। आखिर ऐसा क्यों हुआ कि जो शिक्षक 20-30 सालों से सफलतापूर्वक स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, अचानक उनकी डिग्रियों को अमान्य या अपर्याप्त ठहरा दिया गया?

सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश: क्या है पूरा मामला?

पूरे विवाद की जड़ और वर्तमान संकट का मुख्य कारण सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का एक महत्वपूर्ण आदेश है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से यह निर्देशित किया है कि शिक्षा की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता और राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट के तहत तय किए गए मानकों का पालन हर हाल में होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के प्रभाव में झारखण्ड के लगभग 70,000 शिक्षकों को जेटेट पास करना अनिवार्य कर दिया गया है। न्यायालय ने इन शिक्षकों को अपनी योग्यता साबित करने और नियमावली के अनुरूप खुद को ढालने के लिए 31 अगस्त 2028 तक का समय दिया है। आदेश का लब्बोलुआब यह है कि कक्षा एक से आठवीं तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) पास होना अनिवार्य है।

छूट का प्रावधान और उसकी शर्तें:

हालांकि, न्यायालय ने आदेश में कुछ मानवीय पहलुओं को भी ध्यान में रखा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, ऐसे शिक्षक जिनकी सेवा निवृत्ति (Retirement) में मात्र पांच वर्ष या उससे कम का समय बचा है, उन्हें इस परीक्षा को पास करने की शर्त से छूट दी गई है। लेकिन यह छूट बिना शर्त नहीं है। इसके साथ यह कड़ी शर्त जोड़ी गई है कि ये शिक्षक भविष्य में किसी भी प्रकार की ‘प्रोन्नति’ (Promotion) का दावा नहीं कर सकेंगे। यदि उन्हें पदोन्नति चाहिए, तो उन्हें भी यह परीक्षा हर हाल में पास करनी ही होगी।

यह आदेश सुनने में भले ही शिक्षा व्यवस्था को सुधारने वाला एक प्रगतिशील कदम लगे, लेकिन जब इसे जमीन पर उतारा गया, तो झारखण्ड के प्रशासनिक ढांचे और पुरानी नियुक्तियों के नियमों के साथ इसका सीधा टकराव हो गया, जिसका खामियाजा आज 25 हजार शिक्षक भुगत रहे हैं।

तकनीकी त्रुटियां और लालफीताशाही: क्यों नहीं जमा हो पा रहे आवेदन?

अब सवाल यह उठता है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने 2028 तक का समय दिया है, तो शिक्षक परीक्षा देने से घबरा क्यों रहे हैं? असल में, समस्या परीक्षा देने से कतराने की नहीं है, समस्या यह है कि सिस्टम उन्हें परीक्षा में बैठने ही नहीं दे रहा है! झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक) की ओर से जेटेट के लिए आवेदन मांगे गए, जिसकी अंतिम तिथि 20 जून तय की गई। लेकिन जब इन शिक्षकों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से फॉर्म भरने का प्रयास किया, तो तकनीकी त्रुटियों और नियमावली के पेंच ने उनके रास्ते बंद कर दिए।

परेशानी की मुख्य वजहें:

1. अलग-अलग दौर की नियुक्तियां और आज की नियमावली (The 2012 JTET Rules Paradox):

जेटेट की वर्तमान नियमावली वर्ष 2012 में बनी थी। इस नियमावली में कक्षा एक से पांच (प्राथमिक) और कक्षा छह से आठ (मध्य विद्यालय) के लिए अलग-अलग योग्यताएं और प्रशिक्षण मानक निर्धारित किए गए हैं। समस्या यह है कि जिन 25 हजार शिक्षकों के सिर पर नौकरी जाने का खतरा मंडरा रहा है, उनकी नियुक्ति 2012 से बहुत पहले हुई थी। जब उनकी नियुक्ति हुई थी, तब नियम कुछ और थे, और आज परीक्षा देने के नियम कुछ और हैं। दोनों नियमावलियों में कोई तालमेल नहीं है।

2. 1994 और 1999 के शिक्षकों का संकट (एक वर्ष का सेवाकालीन प्रशिक्षण):

आइये इस मामले को और बारीकी से समझते हैं। राज्य (तत्कालीन एकीकृत बिहार) में वर्ष 1994 और 1999 में बड़ी संख्या में अप्रशिक्षित (Untrained) शिक्षकों की नियुक्ति की गई थी। उस दौर में शिक्षकों की भारी कमी को देखते हुए यह कदम उठाया गया था। नियुक्ति के बाद, सरकार ने ही इन शिक्षकों को एक वर्ष का ‘सेवाकालीन प्रशिक्षण’ (In-service training) प्रदान किया था ताकि वे प्रशिक्षित शिक्षकों की श्रेणी में आ सकें। दशकों तक यह व्यवस्था सुचारू रूप से चली। लेकिन, आज की 2012 की जेटेट नियमावली में इस ‘एक वर्षीय सेवाकालीन प्रशिक्षण’ को मान्यता देने का कोई प्रावधान ही नहीं है। आज पोर्टल केवल दो वर्षीय D.El.Ed या B.Ed की मांग करता है। ऐसे में 1994 और 1999 में नियुक्त शिक्षक, जिन्होंने सरकार द्वारा दिया गया प्रशिक्षण ही प्राप्त किया था, उनका आवेदन पत्र पोर्टल तकनीकी रूप से स्वीकार ही नहीं कर रहा है।

3. 2003 के शिक्षकों का विषय और योग्यता का टकराव (The Cross-Qualification Issue):

वर्ष 2003 में राज्य के प्राथमिक व मध्य विद्यालयों में बड़े पैमाने पर शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी। उस समय के प्रावधानों के अनुसार ‘डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन’ (D.El.Ed) और ‘बीएड’ (B.Ed) सफल अभ्यर्थी परीक्षा में शामिल हुए थे। नियुक्ति प्रक्रिया में कक्षा एक से आठ तक के लिए एक साथ प्रारंभिक शिक्षक के रूप में नियुक्तियां कर दी गईं।

अब आज की विडंबना देखिए: 2003 में नियुक्त एक ऐसा शिक्षक, जिसके पास ‘डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन’ है, लेकिन वह विभागीय आदेशों के तहत पिछले 20 सालों से ‘कक्षा छह से आठ’ में पढ़ा रहा है, वह जेटेट का फॉर्म नहीं भर पा रहा। क्यों? क्योंकि आज के नियम कहते हैं कि छह से आठ के लिए B.Ed होना चाहिए।

इसी तरह, कोई शिक्षक जिसके पास B.Ed की डिग्री है, लेकिन उसे 2003 में ‘कक्षा एक से पांच’ के बच्चों को पढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया था, वह भी आवेदन जमा नहीं कर पा रहा है, क्योंकि आज के नियम कक्षा एक से पांच के लिए D.El.Ed मांगते हैं (हाल ही के सुप्रीम कोर्ट के B.Ed vs D.El.Ed फैसले के बाद यह और भी जटिल हो गया है)। इन शिक्षकों की क्या गलती है? इन्हें जहां विभाग ने पदस्थापित किया, इन्होंने वहां ईमानदारी से पढ़ाया। आज अचानक इनकी डिग्रियों और इनके कार्यक्षेत्र के बीच बेमेल स्थिति पैदा कर दी गई है।

4. उम्र सीमा का सबसे बड़ा पेंच (The Age Limit Dilemma):

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप सभी शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करनी है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि अगर किसी शिक्षक की उम्र 59 वर्ष भी है और वह पदोन्नति चाहता है या अपनी नौकरी सुरक्षित रखना चाहता है (यदि 5 वर्ष से अधिक सेवा बची है), तो उसे परीक्षा देनी होगी।

लेकिन, कार्मिक विभाग की जो वर्तमान नियमावली है, उसमें जेटेट परीक्षा के लिए अधिकतम उम्र सीमा में मात्र कुछ ही वर्षों की छूट दी गई है। एक शिक्षक जिसकी उम्र 55, 57 या 59 वर्ष हो चुकी है, जब वह फॉर्म भरने जाता है, तो कंप्यूटर सिस्टम उसे ‘ओवरएज’ (Overage) बताकर बाहर कर देता है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट कहता है कि परीक्षा दो, दूसरी तरफ राज्य सरकार का पोर्टल कहता है कि आप परीक्षा देने के लिए बहुत बूढ़े हो चुके हैं। इस विरोधाभास के बीच पिसता हुआ वह शिक्षक मानसिक अवसाद से गुजर रहा है।

मानवीय और मनोवैज्ञानिक पहलू: एक शिक्षक की व्यथा

कानून, नियम और अदालत के आदेश अपनी जगह हैं, लेकिन इस पूरे प्रकरण का एक बहुत गहरा मानवीय और मनोवैज्ञानिक पहलू भी है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कल्पना कीजिए उस शिक्षक की, जिसने 1994 में 20-25 वर्ष की आयु में एक सुदूर गांव के स्कूल में चौक और डस्टर थामा था। आज उसकी उम्र 50 से 55 वर्ष के बीच है। उसके जीवन का अधिकांश हिस्सा ब्लैकबोर्ड के सामने बीता है। उसके पढ़ाए हुए कई बच्चे आज डॉक्टर, इंजीनियर और आईएएस अधिकारी बन चुके होंगे। उसके बाल पक चुके हैं, आंखों पर मोटा चश्मा लग चुका है। आज जब वह अपने जीवन की संध्या में है, और उसे सम्मानजनक सेवानिवृत्ति की प्रतीक्षा करनी चाहिए, तब अचानक एक सरकारी फरमान आता है कि “आपकी डिग्री मान्य नहीं है, आपकी नौकरी खतरे में है, आपको फिर से परीक्षा देनी होगी।”

यह स्थिति न केवल अपमानजनक है, बल्कि अत्यधिक तनावपूर्ण भी है। 55 वर्ष की उम्र में किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा करना कि वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे 25 साल के युवाओं के साथ बैठे और आधुनिक परीक्षा प्रणाली (जो संभवतः कंप्यूटर आधारित हो सकती है) का सामना करे, यह व्यावहारिक रूप से कितना उचित है? और यदि वह ऐसा करना भी चाहे, तो सिस्टम की तकनीकी खामियां उसे फॉर्म तक नहीं भरने दे रही हैं। इन 25 हजार शिक्षकों के घरों में आज क्या माहौल होगा? क्या वे तनावमु्क्त होकर स्कूलों में बच्चों को पढ़ा पा रहे होंगे? निश्चित रूप से नहीं। अनिश्चितता का यह माहौल शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के बजाय उसे और गर्त में ले जा रहा है।

शिक्षा विभाग और सरकार का रुख

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ऐसा नहीं है कि शिक्षा विभाग पूरी तरह आंखें मूंदे बैठा है, लेकिन उसकी गति इतनी धीमी है कि शिक्षकों की बेचैनी बढ़ती जा रही है।

अखबार की कतरन में स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव उमाशंकर सिंह का एक महत्वपूर्ण बयान छपा है। वे कहते हैं: “प्रशिक्षण से संबंधित मामले पर विभाग विचार कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप शिक्षकों के लिए पात्रता परीक्षा ली जायेगी। इसे लेकर आवश्यक कार्रवाई की जा रही है।”

इस बयान से यह तो स्पष्ट है कि मामला उच्चाधिकारियों के संज्ञान में है। जैक (JAC) ने स्थिति की पेचीदगी को समझते हुए जेटेट के लिए आवेदन जमा करने की तिथि भी 20 जून तक बढ़ाई थी। लेकिन केवल तिथि बढ़ा देना किसी बीमारी का इलाज नहीं है। जब तक बीमारी का कारण (नियमावली की विसंगतियां) दूर नहीं किया जाता, तब तक तिथि चाहे कितनी भी आगे बढ़ा दी जाए, वे 25 हजार शिक्षक फॉर्म नहीं भर पाएंगे।

सिस्टम की नाकामी का विश्लेषण:

यह पूरा प्रकरण हमारे देश और राज्यों की प्रशासनिक कार्यप्रणाली की एक बड़ी विफलता को दर्शाता है।

  1. दूरदृष्टि का अभाव (Lack of Foresight): जब 2012 में जेटेट की नियमावली बन रही थी, तब क्या नीति-निर्माताओं को यह याद नहीं था कि राज्य में 1994, 1999 और 2003 में किस आधार पर नियुक्तियां हुई हैं? किसी भी नए नियम को बनाते समय ‘रेट्रोस्पेक्टिव इफ़ेक्ट’ (पूर्वव्यापी प्रभाव) और पुरानी व्यवस्थाओं के एकीकरण (Integration) का ध्यान रखा जाना चाहिए था।
  2. संवादहीनता (Lack of Communication): शिक्षा विभाग, कार्मिक विभाग और झारखंड एकेडमिक काउंसिल के बीच भारी संवादहीनता दिखती है। कोर्ट आदेश देता है, शिक्षा विभाग परीक्षा आयोजित करने को कहता है, लेकिन कार्मिक विभाग उम्र सीमा में वह जरूरी छूट नहीं देता जो पोर्टल पर फॉर्म सबमिट करने के लिए आवश्यक है। यह विभिन्न विभागों के बीच तालमेल की घोर कमी है।

क्या हो सकता है समाधान? (The Way Forward)

इस संकट को टालने और 25 हजार शिक्षकों के परिवारों को सड़क पर आने से बचाने के लिए झारखण्ड सरकार और शिक्षा विभाग को युद्ध स्तर पर कुछ ठोस और त्वरित कदम उठाने होंगे:

1. जेटेट नियमावली 2012 में तत्काल संशोधन (Immediate Amendment in JTET Rules):

राज्य कैबिनेट को आपातकालीन बैठक बुलाकर 2012 की जेटेट नियमावली में एक ‘वन-टाइम रिलैक्सेशन’ (एकमुश्त छूट) का प्रावधान जोड़ना चाहिए। इसमें स्पष्ट रूप से लिखा जाना चाहिए कि 1994 और 1999 के दौरान जिन शिक्षकों ने सरकार द्वारा प्रायोजित ‘एक वर्षीय सेवाकालीन प्रशिक्षण’ प्राप्त किया है, उन्हें वर्तमान परीक्षा के लिए वैध (Valid) माना जाएगा।

2. उम्र सीमा में विशेष छूट का शासनादेश (Special Order for Age Relaxation):

कार्मिक विभाग को तुरंत एक नया संकल्प (Resolution) जारी करना चाहिए जिसमें यह स्पष्ट हो कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में जो भी कार्यरत शिक्षक जेटेट परीक्षा देना चाहते हैं, उनके लिए अधिकतम उम्र सीमा की कोई बाध्यता नहीं होगी। कंप्यूटर पोर्टल (NIC द्वारा संचालित) के सॉफ्टवेयर में भी यह बदलाव 24 घंटे के भीतर किया जाना चाहिए ताकि 50-59 वर्ष के शिक्षक बिना किसी बाधा के फॉर्म भर सकें।

3. ब्रिज कोर्स (Bridge Course) का विकल्प:

2003 बैच के शिक्षकों के लिए (जो योग्यता के विपरीत कक्षाओं में पढ़ा रहे हैं), एक व्यावहारिक समाधान यह है कि सरकार उन्हें नौकरी से निकालने या परीक्षा से वंचित करने के बजाय एक 6 महीने का ‘ब्रिज कोर्स’ (सेतु पाठ्यक्रम) करवाए। उदाहरण के लिए, जिस D.El.Ed धारी ने 20 साल छह से आठ तक पढ़ाया है, उसे एक छोटा सा विभागीय कोर्स करवाकर उस कक्षा के लिए वैध मान लिया जाए। नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) की गाइडलाइंस में भी विशेष परिस्थितियों में ऐसे ब्रिज कोर्स का प्रावधान है।

4. काउंसलिंग और हेल्प डेस्क की स्थापना:

शिक्षकों के बीच फैले भ्रम और डर को दूर करने के लिए हर जिले के जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) कार्यालय में एक विशेष ‘हेल्प डेस्क’ बनाई जानी चाहिए। यह डेस्क शिक्षकों के दस्तावेजों की जांच कर उन्हें सही तरीके से फॉर्म भरने में तकनीकी सहायता प्रदान करे।

5. सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका (Review Petition) या हलफनामा:

यदि राज्य सरकार को लगता है कि वर्तमान तकनीकी विसंगतियों को दो साल के भीतर सुलझाना और सभी को परीक्षा दिलवाना संभव नहीं है, तो राज्य सरकार को शिक्षकों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल करना चाहिए। इसमें न्यायालय को राज्य की जमीनी हकीकत, 1994/2003 के नियुक्ति नियमों और तकनीकी दिक्कतों से अवगत कराया जाना चाहिए, ताकि न्यायालय भी कुछ व्यावहारिक दिशा-निर्देश दे सके।

निष्कर्ष: शिक्षा का मंदिर बनाम कानूनी चक्रव्यूह

झारखण्ड के 25 हजार शिक्षकों की यह पीड़ा केवल एक खबर नहीं है, यह हमारे सिस्टम की उस संवेदनहीनता का जीता-जागता प्रमाण है जहां नीतियां एयर-कंडीशन्ड कमरों में बैठ कर बनाई जाती हैं और उनका खामियाजा सुदूर जंगलों, पहाड़ों और कस्बों में काम करने वाला आम कर्मचारी भुगतता है।

एक शिक्षक जीवन भर दूसरों का मार्गदर्शन करता है, लेकिन आज झारखण्ड का शिक्षक खुद इस बात का मार्गदर्शन खोज रहा है कि वह अपने परिवार का पेट कैसे पालेगा? सुप्रीम कोर्ट का आदेश शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए है, जिसका सम्मान हर हाल में होना चाहिए। लेकिन “गुणवत्ता” लाने की आड़ में हम उन लोगों को प्रताड़ित नहीं कर सकते जिन्होंने उस समय राज्य की शिक्षा व्यवस्था को अपने कंधों पर उठाया, जब राज्य में बुनियादी ढांचा तक नहीं था।

राज्य सरकार के पास अभी भी समय है। 31 अगस्त 2028 का समय सीमा भले ही दूर दिख रही हो, लेकिन न्याय और सुधार की प्रक्रिया आज से, बल्कि अभी से शुरू होनी चाहिए। कागजी त्रुटियों और नियमावली की खामियों को दूर करना राज्य सरकार के हाथ में है। यह समय लालफीताशाही में उलझने का नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति (Willpower) दिखाने का है।

यदि झारखण्ड सरकार इन 25 हजार शिक्षकों की समस्या का समय रहते तकनीकी और कानूनी समाधान नहीं निकाल पाती है, तो यह केवल उन शिक्षकों की हार नहीं होगी, बल्कि राज्य के उस पूरे शिक्षा तंत्र की हार होगी जिसने अपने ही ‘गुरुओं’ को नियमावली के पन्नों में दफन कर दिया। समय आ गया है कि शिक्षा विभाग नींद से जागे और इस मानवीय संकट का एक स्थायी, पारदर्शी और न्यायसंगत हल निकाले, ताकि शिक्षक बिना किसी डर के वापस उस काम में लग सकें जो वे सबसे बेहतर करते हैं—आने वाली पीढ़ियों का निर्माण!

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