जेपीएससी (JPSC) की आंसर-की में गलतियों का पहाड़: अपने ही राज्य का इतिहास भूला आयोग, 75 जवाबों पर उठे सवाल
रांची-जमशेदपुर (संजीव सिंह/संदीप सावर्ण की रिपोर्ट पर आधारित): झारखण्ड लोक सेवा आयोग (JPSC) एक बार फिर अपनी कार्यशैली को लेकर गहरे विवादों में घिर गया है। राज्य के लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने की जेपीएससी की ‘मिसाल’ एक बार फिर सामने आई है। 19 अप्रैल को आयोजित सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2025 (पीटी) के लिए आयोग ने जो मॉडल आंसर-की जारी की, वह सही उत्तरों की सूची नहीं, बल्कि ‘गलतियों का ऐसा पहाड़’ साबित हुई है जिसे देखकर शिक्षा जगत भी हैरान है।
आलम यह है कि जिन सामान्य सवालों के जवाब कक्षा आठवीं के बच्चों को जुबानी याद होते हैं, वहां भी जेपीएससी के विशेषज्ञों ने औंधे मुंह गिरने का काम किया है। ‘प्रभात खबर’ की पड़ताल में आयोग की इन गलतियों का पूरा कच्चा चिट्ठा सामने आया है।
24 घंटे का ड्रामा: पहली आंसर-की हटी, दूसरी में भी ‘खेल’
आयोग ने 21 अप्रैल 2026 की शाम को अपनी वेबसाइट पर प्रारंभिक परीक्षा की पहली मॉडल आंसर-की अपलोड की थी। लेकिन जैसे ही ‘प्रभात खबर’ ने इन गलतियों की पड़ताल शुरू की और अधिकारियों से जानकारी लेनी चाही, तो संभावित फजीहत के डर से आयोग ने आनन-फानन में मात्र चार घंटे के बाद ही इसे आधिकारिक वेबसाइट से हटा लिया।
हालांकि, जेपीएससी की इस घबराहट के बावजूद ‘गलतियों के पुलिंदे’ की पूरी कॉपी मीडिया के पास सुरक्षित रह गई। इसके अगले दिन यानी 21 अप्रैल को ही शाम तक आयोग ने संशोधित मॉडल उत्तर वेबसाइट पर अपलोड कर दिया। लेकिन यहाँ भी आयोग की लापरवाही सामने आई।
आयोग द्वारा जारी की गई दूसरी आंसर-की 21 अप्रैल को अपलोड हुई, लेकिन उसके साथ जारी नोटिस 20 अप्रैल 2026 का ही पुराना चिपका दिया गया। इस नोटिस में अभ्यर्थियों से 20 अप्रैल 2026 से 24 अप्रैल 2026 (शाम पांच बजे) तक आपत्ति/सुझाव मांगे गए हैं। आयोग ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि दोबारा अपलोड किया गया मॉडल उत्तर संशोधित है या नहीं।
पेपर-1: इतिहास, भूगोल और विज्ञान— हर मोर्चे पर फेल हुए विशेषज्ञ
सामान्य अध्ययन (General Studies) पेपर-1 में पूछे गए 100 सवालों में से लगभग 75 सवालों के उत्तर गलत दिए गए। जेपीएससी के विशेषज्ञों की अज्ञानता के कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं:
- COP30 सम्मेलन: जेपीएससी की आंसर-की के अनुसार यह जलवायु सम्मेलन ‘अमेरिका’ में हुआ, जबकि पूरी दुनिया जानती है कि यह ‘ब्राजील’ में आयोजित हुआ था।
- मानवाधिकार दिवस: पूरी दुनिया 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस मनाती है, लेकिन जेपीएससी की दुनिया में यह 8 मार्च को मनाया जाता है।
- मेक इन इंडिया: यह महत्वाकांक्षी योजना 2014 में शुरू हुई थी, लेकिन आयोग 2022 की उपज बता रहा है।
- पद्म विभूषण 2025: आयोग ने असली सूची की जगह विवेक देबरॉय को सही जवाब बता दिया।
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग: भारत में इस आयोग का गठन 12 अक्टूबर 1993 को हुआ था, जबकि जेपीएससी के अनुसार यह 1994 में हुआ।
- अंतरराष्ट्रीय विवाद: वर्ष 2007 से गाजा पट्टी पर ‘हमास’ का नियंत्रण है, लेकिन जेपीएससी कहता है कि यह ‘पीएलओ’ (PLO) का है।
- मणिपुर हिंसा 2023: यह हिंसक झड़प मुख्य रूप से ‘मैतेई और कुकी’ समुदायों के बीच थी, जबकि जेपीएससी ने इसे ‘मैतेई और गारो’ के बीच बता दिया।
- विज्ञान में हास्यास्पद गलती: आयोग ने विज्ञान के क्षेत्र में तो गजब ही कर दिया। एक सवाल में पूछा गया कि ‘कौन सी गैस वायुमंडल में सबसे कम है?’ जेपीएससी ने ‘नाइट्रोजन’ (जो कि 78% के साथ सबसे अधिक है) को सबसे कम बता दिया। वहीं, ओजोन परत के क्षरण के लिए CFCs की जगह CO2 को जिम्मेदार ठहरा दिया।
पेपर-2: अपने ही राज्य झारखण्ड के भूगोल और इतिहास के साथ खिलवाड़
सामान्य अध्ययन पेपर-2 (झारखण्ड विशेषांक) में भी चार से पांच भारी गलतियां देखने को मिलीं। आयोग ने अपने ही राज्य के गौरवशाली इतिहास और भूगोल को नहीं बख्शा:
- टांगीनाथ मंदिर का स्थान बदला: प्रसिद्ध टांगीनाथ मंदिर, जो गुमला जिले के डुमरी ब्लॉक में स्थित है, उसे आयोग ‘लातेहार’ में बता रहा है।
- महाभारत का ‘पुण्डरीक देश’: झारखण्ड के लिए महाभारत में प्रयुक्त ‘पुण्डरीक देश’ वाले तथ्य को बदलकर आयोग ने उसे ‘अथर्ववेद’ का हिस्सा बना दिया।
- दिशोम गुरु के नाम में हेरफेर: 1994 में दिशोम गुरु शिबू सोरेन झारखण्ड क्षेत्र स्वायत्त परिषद (JAAC) के अध्यक्ष बने थे, उनके नाम में भी आयोग ने हेरफेर कर दिया।
- पलामू पर अधिकार (1771): पलामू पर अधिकार करने के लिए भेजे गए ब्रिटिश अधिकारी “कैप्टन जैकब कैमेक” को आयोग ने “कैप्टन डेग” बता दिया। इससे समझा जा सकता है कि आंसर-की तैयार करने वाले विशेषज्ञों ने इतिहास की किताबों से कितनी दूरी बना रखी है।
रातों-रात देहरादून से रांची शिफ्ट हुआ संस्थान!
जेपीएससी के कारनामों की बानगी जनरल स्टडीज पेपर 1 (सीरीज-A) के सवाल नंबर 69 में साफ दिखती है। सवाल पूछा गया था कि ‘वन्यजीव संस्थान भारत के किस शहर में स्थित है?’
आयोग ने विकल्प D यानी ‘रांची’ को सही बता दिया, जबकि हकीकत यह है कि यह राष्ट्रीय संस्थान ‘देहरादून’ में है। ऐसा लगता है जैसे आयोग के विशेषज्ञों ने रातों-रात देहरादून के संस्थान को रांची शिफ्ट कर दिया हो।
गृहमंत्री को बना दिया आपदा प्रबंधन का अध्यक्ष
संविधान और प्रशासन की बुनियादी समझ पर भी सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। सवाल नंबर 39 में पूछा गया कि ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण’ (NDMA) के अध्यक्ष कौन हैं?
नियमतः देश के प्रधानमंत्री इस प्राधिकरण के पदेन अध्यक्ष होते हैं, लेकिन जेपीएससी अपने ही कायदे चला रहा है। आयोग ने प्रधानमंत्री की जगह ‘अमित शाह’ (गृहमंत्री) को अध्यक्ष घोषित कर दिया।
निष्कर्ष
जेपीएससी द्वारा की गई ये गलतियां केवल एक टाइपिंग मिस्टेक नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर एक गंभीर सवाल हैं जो राज्य के भविष्य के अधिकारियों का चयन करती है। जब परीक्षा लेने वाली सर्वोच्च संस्था के विशेषज्ञ ‘नाइट्रोजन’ को सबसे कम गैस और ‘देहरादून’ के संस्थान को ‘रांची’ में बता दें, तो अभ्यर्थियों का व्यवस्था से मोहभंग होना लाजमी है। ‘प्रभात खबर’ द्वारा उजागर किए गए इस ‘गलतियों के पुलिंदे’ ने एक बार फिर जेपीएससी की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है।