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झारखंड के सरकारी स्कूलों में टाइमिंग पर महा-बवाल: कोरोना काल के ‘अस्थाई’ नियम और भीषण गर्मी में झुलसते बच्चे

झारखंड के सरकारी स्कूलों में टाइमिंग पर महा-बवाल: कोरोना काल के ‘अस्थाई’ नियम और भीषण गर्मी में झुलसते बच्चे

नए सत्र की शुरुआत और एक अव्यावहारिक सरकारी फरमान

झारखंड के सरकारी स्कूलों में 1 अप्रैल से नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने जा रहा है। हर साल की तरह, इस साल भी नए सत्र को लेकर छात्रों और शिक्षकों में एक नई उम्मीद होनी चाहिए थी। लेकिन, इस बार नए सत्र की शुरुआत के साथ ही स्कूलों की टाइमिंग को लेकर राज्य भर में एक बड़ा और गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। शिक्षा विभाग ने राज्य के सभी सरकारी विद्यालयों के संचालन का समय सुबह 7:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक तय किया है।

वातानुकूलित (AC) कमरों में बैठकर लिया गया यह फैसला जमीनी हकीकत से कोसों दूर नजर आता है। इस फैसले का ‘झारखंड प्रगतिशील शिक्षक संघ’, ‘अखिल झारखण्ड प्राथमिक शिक्षक संघ’ और ‘झारखण्ड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ’ सहित तमाम शिक्षक संगठनों ने एकजुट होकर कड़ा विरोध किया है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जो नियम कोरोना (Covid-19) महामारी के बाद हुए शैक्षणिक नुकसान की भरपाई के लिए एक ‘अस्थाई’ व्यवस्था के रूप में सिर्फ तीन साल के लिए लागू किए गए थे, उन्हें अवधि पूरी होने के बाद भी जबरन क्यों थोपा जा रहा है?

यह लेख इसी ज्वलंत मुद्दे, विभिन्न शिक्षक संघों के पत्रों में छिपे दर्द, छात्रों के स्वास्थ्य पर मंडराते खतरे और शिक्षा विभाग की हठधर्मिता का एक विस्तृत और तथ्यात्मक विश्लेषण करता है।

  1. कोरोना काल का ‘अस्थाई’ नियम: कैसे एक आपातकालीन व्यवस्था बन गई स्थायी गले की फांस?

किसी भी नीति के वर्तमान को समझने के लिए उसके इतिहास में जाना आवश्यक है। वर्ष 2020 और 2021 में पूरी दुनिया ने कोविड-19 महामारी का दंश झेला। स्कूल महीनों तक बंद रहे, और छात्रों के सीखने की प्रक्रिया में भारी गिरावट दर्ज की गई।

अप्रैल 2022 की वह अधिसूचना

महामारी के प्रकोप के शांत होने के बाद, बच्चों की पढ़ाई के हुए इस भारी नुकसान (Learning Gap) की भरपाई करने के उद्देश्य से, अप्रैल 2022 में झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद (JEPC) की तत्कालीन निदेशक ने एक अधिसूचना (संख्या- 2144) जारी की थी। इस पत्र के माध्यम से स्कूलों की समय-सीमा बढ़ा दी गई थी।

स्पष्ट था तीन साल का क्लॉज

उस आदेश में एक बात बिल्कुल स्पष्ट थी— यह बदलाव केवल तीन शैक्षणिक वर्षों (2022 से 2025 तक) के लिए एक आपातकालीन उपाय के रूप में लागू रहेगा।

अब जब 2026 आ चुका है और वह तीन साल की निर्धारित अवधि पूरी हो चुकी है, तो न्यायसंगत कदम यही होता कि पुरानी व्यवस्था (सुबह 6:30 से 11:30 बजे तक) को स्वतः बहाल कर दिया जाता। लेकिन सरकारी तंत्र की लालफीताशाही देखिए कि शिक्षा विभाग ने नई टाइमिंग को ही आगे के लिए जारी कर दिया है। यह न सिर्फ अपने ही पुराने आदेश का उल्लंघन है, बल्कि जमीनी वास्तविकता की घोर अनदेखी भी है।

  1. झारखंड की भौगोलिक वास्तविकता और भीषण गर्मी: छात्रों की सेहत पर मंडराता ‘लू’ का सीधा खतरा

नीतियां बनाते समय राज्य की भौगोलिक स्थिति और मौसम चक्र को नजरअंदाज करना एक बड़ी भूल होती है। झारखंड कोई ठंडा प्रदेश नहीं है। अप्रैल से जून के बीच यहाँ का तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है।

सुदूरवर्ती और पहाड़ी इलाकों का संघर्ष

पश्चिमी सिंहभूम, दुमका, गुमला या लातेहार जैसे सुदूरवर्ती, वनाच्छादित और पहाड़ी इलाकों की स्थिति मैदानी शहरों से बिल्कुल अलग है। इन क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन की कोई सुदृढ़ व्यवस्था नहीं है। यहाँ पढ़ने वाले हजारों बच्चों को हर दिन 2 से 5 किलोमीटर तक का सफर पैदल या साइकिल से तय करना पड़ता है।

दोपहर 1:40 बजे का जानलेवा समय और ‘अखिल झारखण्ड प्राथमिक शिक्षक संघ’ का पत्र

28 मार्च 2026 को ‘अखिल झारखण्ड प्राथमिक शिक्षक संघ’ (AJPSS) के प्रदेश महासचिव राम मूर्ति ठाकुर द्वारा स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग को लिखे गए पत्र में एक बहुत ही गंभीर सच्चाई उजागर की गई है। पत्र में स्पष्ट लिखा गया है कि “ग्रीष्मकाल (अप्रैल से जून) में विद्यालय संचालन का समय 7:00 बजे से 1:00 बजे (या 1:40) तक रखना किसी भी दृष्टिकोण से ‘प्रातःकालीन’ (Morning Shift) नहीं कहा जा सकता।” मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि दोपहर 12 बजे से लेकर 3 बजे तक ‘लू’ (Heatwave) का भारी प्रकोप रहता है। प्रतिवर्ष उच्च तापमान और तपिश के कारण बच्चों के विद्यालय में ही बेहोश होने या अस्वस्थ होने की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती हैं।

जरा कल्पना कीजिए: एक छात्र दिन भर की पढ़ाई के बाद, जब दोपहर 1:40 बजे स्कूल से निकलता है, तब आसमान से आग बरस रही होती है। ऐसे मौसम में बच्चों का 3 किलोमीटर पैदल चलकर घर लौटना उन्हें डिहाइड्रेशन (निर्जलीकरण), हीट स्ट्रोक, नकसीर फूटना और भयंकर थकान जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की ओर धकेल रहा है।

ऐतिहासिक संदर्भ (Pre-2001 नियम):

AJPSS ने सरकार को याद दिलाया है कि वर्ष 2001 से पूर्व भी, दशकों तक झारखण्ड (और अविभाजित बिहार) में ग्रीष्मकाल में स्कूलों का समय सुबह 6:30 से 11:30 बजे ही स्वीकृत रहा है, जो कि इस मौसम के लिए सबसे आदर्श और सुरक्षित समय है।

  1. चिलचिलाती दोपहर में पढ़ाई: संज्ञानात्मक पतन (Cognitive Decline) और शिक्षा की गुणवत्ता

शिक्षा विभाग का तर्क हो सकता है कि ज्यादा घंटे स्कूल में बिताने से पढ़ाई ज्यादा होगी। लेकिन शैक्षणिक मनोविज्ञान और विज्ञान इस तर्क को सिरे से खारिज करते हैं।

सरकारी स्कूलों के भवन अक्सर कंक्रीट या एस्बेस्टस (टिन) की छतों वाले होते हैं, जो दोपहर 12 बजे के बाद भट्टी की तरह तपने लगते हैं। कई स्कूलों में बिजली की सुचारू व्यवस्था नहीं है।

ऐसी तपती हुई कक्षाओं में दोपहर 12 बजे के बाद छात्रों का ध्यान केंद्रित रहना जैविक रूप से असंभव हो जाता है। जब शरीर गर्मी से हांफ रहा हो, पेट में भूख हो और गला सूख रहा हो, तब ब्लैकबोर्ड पर लिखे गए गणित, विज्ञान या अर्थशास्त्र के सूत्र छात्रों के दिमाग में बिल्कुल नहीं घुसते। शिक्षक चाहे कितनी भी ऊर्जा लगा लें, दोपहर 1 बजे के बाद का समय ‘जीरो लर्निंग आवर’ (Zero Learning Hour) बन जाता है। ऐसे में समय बढ़ाना सिर्फ खानापूर्ति है, वास्तविक शिक्षा नहीं।

  1. राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट के मानकों का मिथक और वास्तविकता

शिक्षा विभाग के अधिकारियों में अक्सर यह भ्रांति होती है कि समय कम करने से शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम का उल्लंघन होगा। शिक्षक संघों ने आंकड़ों के साथ इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया है।

27 मार्च 2026 को ‘झारखण्ड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ’ (दुमका इकाई) की अध्यक्ष मेरीला मुर्मू और प्रधान सचिव विश्वनाथ गोराई ने माननीय मुख्यमंत्री को लिखे अपने मांग पत्र में इसका विस्तृत गणित समझाया है:

RTE एक्ट 2009 के मानक: अधिनियम के अनुसार, उच्च प्राथमिक विद्यालयों के लिए एक शैक्षणिक वर्ष में अधिकतम 200 से 220 कार्यदिवस और 800 से 1000 शैक्षणिक घंटों की अनिवार्यता है।

झारखंड की वास्तविकता: इसके विपरीत, झारखंड के सरकारी स्कूल पहले से ही इन मानकों से कहीं अधिक काम कर रहे हैं। राज्य में वर्तमान में 240 कार्यदिवस और न्यूनतम 1,440 घंटे का शैक्षणिक समय दिया जा रहा है।

शिक्षक संघ का स्पष्ट तर्क है कि यदि भयंकर गर्मियों के दौरान (अप्रैल से जून) बच्चों के हित में स्कूल के समय को एक या डेढ़ घंटा कम भी कर दिया जाए, तो भी कुल शैक्षणिक घंटे RTE के राष्ट्रीय मानकों से कहीं अधिक ही रहेंगे। इसलिए, RTE का हवाला देकर बच्चों को धूप में तपाना बिल्कुल अनुचित है।

  1. शिक्षकों पर बढ़ता अमानवीय कार्यभार: ‘लीजर पीरियड’ नदारद, क्लर्क का काम मुफ्त

समाज का एक वर्ग अक्सर सोचता है कि शिक्षक सिर्फ पढ़ाते हैं और घर चले जाते हैं। लेकिन आज के सरकारी स्कूल के शिक्षक की सच्चाई बहुत अलग और भयावह है। दुमका शिक्षक संघ के पत्र ने इस दर्द को बखूबी बयां किया है।

बिना क्लर्क के चल रहे स्कूल और डेटा एंट्री का बोझ

राज्य के अधिकांश विद्यालयों में विषयवार शिक्षकों की भारी कमी है। इसके कारण एक शिक्षक को लगातार कई घंटियां (Periods) लेनी पड़ती हैं। उन्हें पूरे दिन में एक भी ‘लीजर पीरियड’ (खाली समय) नहीं मिलता।

पढ़ाने के अलावा, उन पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का भारी बोझ है। विद्यालयों में ‘क्लर्क’ (लिपिक) का कोई पद या प्रावधान नहीं है। इसके परिणामस्वरूप, विद्यालय अवधि के बाद भी शिक्षकों को घंटों रुककर ‘ई-विद्यावाहिनी’ ऐप पर डेटा एंट्री, रिपोर्ट सबमिशन, मिड-डे मील का हिसाब और अन्य ऑनलाइन कार्य करने पड़ते हैं। इन सब कामों को मिला दें, तो एक सरकारी शिक्षक सप्ताह में औसतन 45 घंटे से ज्यादा काम कर रहा है। इस मानसिक और शारीरिक दबाव के बीच, स्कूलों का समय बढ़ाए रखना शिक्षकों को मानसिक अवसाद की तरफ धकेल रहा है।

  1. शनिवार के अवकाश का मुद्दा: प्राईवेट स्कूलों से भेदभाव क्यों?

शिक्षकों और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए ‘वीकेंड’ (Weekend) का बहुत महत्व होता है। पहले शनिवार को स्कूलों में ‘हाफ-डे’ (Half-day) की व्यवस्था होती थी, लेकिन अब सिर्फ महीने के तीसरे शनिवार को छुट्टी रहती है।

शिक्षक संघों ने सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया है कि राज्य के सभी प्राइवेट स्कूलों में प्रत्येक शनिवार और रविवार को पूर्ण साप्ताहिक अवकाश घोषित रहता है। जब प्राइवेट स्कूलों के बच्चे 5 दिन पढ़कर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं, तो सरकारी स्कूलों के बच्चों को 6 दिन क्यों तपाया जा रहा है?

संघ की मांग है कि या तो पुरानी व्यवस्था बहाल करते हुए सभी शनिवार को हाफ-डे किया जाए, या फिर सरकारी स्कूलों में भी प्रत्येक शनिवार को अवकाश (या ‘बैग-लेस डे’) घोषित किया जाए। इससे छात्रों और शिक्षकों को सप्ताह भर की थकान के बाद आवश्यक मानसिक विश्राम मिल सकेगा, जिससे सप्ताह के शेष दिनों में उनका अध्यापन कार्य और अधिक सुदृढ़ होगा।

  1. जनगणना 2027 की ड्यूटी और ग्रीष्मावकाश (Earned Leave) का ज्वलंत मुद्दा

शिक्षकों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण मांग उनके हकों से जुड़ी है। वर्ष 2026 के मई-जून महीने में आगामी जनगणना (Census 2027) का कार्य प्रस्तावित है। इस राष्ट्रीय कार्य में सरकारी शिक्षकों को ही प्रगणक (Enumerator) और पर्यवेक्षक के रूप में झोंका जाएगा।

इस ड्यूटी के कारण शिक्षकों का बहुप्रतीक्षित ग्रीष्मावकाश (22 मई 2026 से 10 जून 2026 तक) पूरी तरह से रद्द हो जाएगा। भारी दोपहरी में घर-घर जाकर डेटा इकट्ठा करना कोई आसान काम नहीं है। जब अन्य गैर-शैक्षणिक विभागों के कर्मचारियों को छुट्टियों के दिन काम करने पर ‘अर्जित अवकाश’ (Earned Leave – EL) मिलता है, तो शिक्षकों को क्यों नहीं?

यदि शिक्षकों से उनके ग्रीष्मावकाश में काम लिया जाता है, तो इसके बदले उन्हें समान दिनों का अतिरिक्त अर्जित अवकाश या उसकी क्षतिपूर्ति दी जानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो यह श्रम अधिकारों का हनन होगा और शिक्षक बुरी तरह हतोत्साहित होंगे।

  1. निष्कर्ष: एक छात्र-हितैषी और व्यावहारिक निर्णय की तत्काल आवश्यकता

झारखंड में सरकारी स्कूलों की नई टाइमिंग का विवाद सिर्फ घंटों के गणित का विवाद नहीं है; यह बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षकों के सम्मान और शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है।

चिलचिलाती गर्मी में बच्चों को दोपहर 1:40 बजे तक स्कूल में रोकना उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ है। झारखंड प्रगतिशील शिक्षक संघ, दुमका जिला शिक्षक संघ और अखिल झारखण्ड प्राथमिक शिक्षक संघ द्वारा उठाई गई मांगें न केवल तार्किक हैं, बल्कि वे पूरी तरह से आंकड़ों, RTE मानकों और मानवीय संवेदनाओं पर आधारित हैं।

राज्य सरकार, माननीय मुख्यमंत्री और शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों को चाहिए कि वे वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत को समझें। वर्तमान अधिसूचना को निरस्त करते हुए, 1 अप्रैल से स्कूलों का समय सुबह 6:30 से 11:30 बजे तक करने का आदेश अविलंब जारी किया जाना चाहिए। इसके साथ ही शनिवार के अवकाश, गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ कम करने और जनगणना ड्यूटी के बदले अर्जित अवकाश देने जैसी मांगों पर भी सकारात्मक निर्णय लिया जाना चाहिए।

जब शिक्षक तनावमुक्त होंगे और छात्र शारीरिक रूप से स्वस्थ एवं सुरक्षित महसूस करेंगे, तभी झारखंड के सरकारी स्कूलों में शिक्षा की वास्तविक लौ प्रज्वलित हो सकेगी। नीतियां वह नहीं जो ऊपर से थोपी जाएं, नीतियां वह हैं जो जमीन पर जीवन को बेहतर बनाएं।

💬 अब आपकी बारी है! क्या आपको लगता है कि शिक्षा विभाग को अपनी जिद छोड़कर जमीनी हकीकत को स्वीकार करना चाहिए? क्या भीषण गर्मी में आपके क्षेत्र में बच्चों का दोपहर 2 बजे स्कूल से लौटना सुरक्षित है? इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपने विचार और सुझाव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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Disclaimer):
यह लेख विभिन्न शिक्षक संघों द्वारा सौंपे गए आधिकारिक मांग पत्रों और वर्तमान समाचार रिपोर्टों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना और संबंधित विषय पर जन-जागरूकता लाना है। स्कूल की टाइमिंग, छुट्टियों या विभागीय नियमों से संबंधित किसी भी अंतिम और आधिकारिक जानकारी के लिए कृपया स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, झारखंड सरकार की वेबसाइट और उनके द्वारा जारी आधिकारिक आदेशों को ही प्रामाणिक मानें।

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