भारतीय अर्थव्यवस्था: स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर और नियोजन के युग की शुरुआत
यह नोट्स भारतीय अर्थव्यवस्था की स्वतंत्रता-पूर्व स्थिति और स्वतंत्रता के बाद नियोजन युग की शुरुआत, उसके लक्ष्यों और विकास की रणनीतियों पर केंद्रित है।
भाग 1: स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ
स्वतंत्रता (1947) के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के लगभग 200 वर्षों के शोषणकारी प्रभाव को दर्शाती थी। इसे मुख्य रूप से एक पिछड़ी, गतिहीन और कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था के रूप में वर्णित किया जा सकता है।
मुख्य विशेषताएँ:
1. कृषि क्षेत्र में पिछड़ापन (Backwardness of Agriculture Sector):
- कम उत्पादकता: कृषि में उत्पादन और उत्पादकता दोनों बहुत कम थे। पुरानी तकनीक, सिंचाई सुविधाओं का अभाव और उर्वरकों के नगण्य उपयोग के कारण पैदावार कम थी।
- शोषणकारी भूमि बंदोबस्त प्रणाली: अंग्रेजों द्वारा शुरू की गई ज़मींदारी प्रथा ने किसानों (काश्तकारों) का भारी शोषण किया। ज़मींदार किसानों से भारी लगान वसूलते थे, जिससे उनके पास कृषि में निवेश करने या अपनी आजीविका सुधारने के लिए कुछ नहीं बचता था।
- कृषि का व्यवसायीकरण (Commercialisation of Agriculture): अंग्रेजों ने किसानों को खाद्य फसलों (जैसे गेहूं, चावल) के बजाय नकदी फसलों (जैसे कपास, जूट, नील) उगाने के लिए मजबूर किया, ताकि ब्रिटिश उद्योगों को कच्चा माल मिल सके। इससे भारत में खाद्य असुरक्षा और अकाल की स्थिति पैदा हुई।
- जोत का विखंडन: कृषि भूमि छोटे-छोटे और बिखरे हुए टुकड़ों में बंटी हुई थी, जिससे आधुनिक खेती करना असंभव था।
2. औद्योगिक क्षेत्र का पतन (Deindustrialisation):
- हस्तशिल्प का पतन: भारत अपने उत्कृष्ट हस्तशिल्प (जैसे सूती और रेशमी वस्त्र, धातु के बर्तन) के लिए विश्व प्रसिद्ध था। ब्रिटिश नीतियों ने जानबूझकर इस उद्योग को नष्ट कर दिया। भारतीय हस्तशिल्प पर भारी निर्यात कर लगाया गया, जबकि ब्रिटेन से मशीनों द्वारा निर्मित सस्ते सामानों को बिना किसी आयात शुल्क के भारत में प्रवेश करने दिया गया।
- आधुनिक उद्योगों का अभाव: ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में आधुनिक उद्योगों का विकास बहुत धीमा रहा। केवल कुछ सूती वस्त्र (पश्चिमी भारत में) और जूट मिलें (बंगाल में) स्थापित हुईं।
- पूंजीगत वस्तु उद्योगों का अभाव: मशीनें और उपकरण बनाने वाले उद्योगों (Capital Goods Industries) का लगभग अभाव था, जो औद्योगीकरण के लिए आवश्यक हैं।
3. विदेशी व्यापार (Foreign Trade) की दिशा और संरचना:
- कच्चे माल का निर्यातक और तैयार माल का आयातक: भारत ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल (कपास, जूट, नील) का शुद्ध निर्यातक और ब्रिटेन के कारखानों में बने तैयार माल (कपड़े, मशीनरी) का शुद्ध आयातक बन गया।
- ब्रिटेन का एकाधिकार: भारत के विदेशी व्यापार पर ब्रिटेन का लगभग एकाधिकार था। भारत का आधे से अधिक व्यापार केवल ब्रिटेन तक सीमित था।
- निर्यात अधिशेष का दुरुपयोग: यद्यपि भारत का निर्यात आयात से अधिक था (निर्यात अधिशेष), लेकिन इस अधिशेष का उपयोग भारत के विकास के लिए नहीं किया गया। इसका उपयोग ब्रिटिश सरकार के प्रशासनिक खर्चों, युद्धों और ‘धन की निकासी’ (Drain of Wealth) के लिए किया गया।
4. जनांकिकीय स्थिति (Demographic Condition):
- उच्च जन्म दर और उच्च मृत्यु दर: दोनों दरें बहुत अधिक थीं, जो व्यापक गरीबी और खराब स्वास्थ्य सुविधाओं को दर्शाती हैं।
- कम जीवन प्रत्याशा: औसत जीवन प्रत्याशा बहुत कम (लगभग 32 वर्ष) थी।
- कम साक्षरता दर: साक्षरता दर केवल 16% थी, और महिला साक्षरता तो और भी कम (लगभग 7%) थी।
- खराब स्वास्थ्य सुविधाएँ: सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएँ नगण्य थीं, जिसके कारण जल-जनित और वायु-जनित बीमारियाँ आम थीं और मातृ एवं शिशु मृत्यु दर बहुत अधिक थी।
5. खराब आधारभूत संरचना (Poor Infrastructure):
- आधारभूत संरचना जैसे रेलवे, सड़क, बंदरगाह, संचार और बिजली का विकास बहुत सीमित था।
- अंग्रेजों ने रेलवे और सड़कों का विकास मुख्य रूप से अपने प्रशासनिक और सैन्य उद्देश्यों और कच्चे माल को बंदरगाहों तक पहुँचाने के लिए किया था, न कि भारत के आर्थिक विकास के लिए।
निष्कर्ष (स्वतंत्रता के समय):
स्वतंत्रता के समय भारत एक गरीब, अल्पविकसित, और कृषि पर निर्भर अर्थव्यवस्था था, जिसका औद्योगिक आधार बहुत कमजोर था और व्यापक गरीबी और अशिक्षा थी।
भाग 2: नियोजन युग की शुरुआत (Start of Planning Era)
स्वतंत्रता के बाद, भारत के सामने एक गरीब और पिछड़ी अर्थव्यवस्था को एक आधुनिक और विकसित अर्थव्यवस्था में बदलने की एक बड़ी चुनौती थी। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, भारत ने ‘आर्थिक नियोजन’ (Economic Planning) का मार्ग चुना।
- योजना आयोग की स्थापना: 1950 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में योजना आयोग (Planning Commission) की स्थापना की गई।
- पंचवर्षीय योजनाएँ: भारत ने सोवियत संघ (USSR) से प्रेरित होकर पंचवर्षीय योजनाओं (Five Year Plans) के माध्यम से विकास का मॉडल अपनाया।
- मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy): भारत ने पूँजीवादी और समाजवादी दोनों प्रणालियों के अच्छे तत्वों को मिलाकर ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ का मॉडल अपनाया। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र (सरकार) और निजी क्षेत्र (निजी व्यवसाय) दोनों की भूमिका निर्धारित की गई, लेकिन शुरुआत में सार्वजनिक क्षेत्र को अर्थव्यवस्था के “कमांडिंग हाइट्स” (Commanding Heights) पर रखा गया।
विकास के लक्ष्य (Goals of Development/Planning)
भारत की पंचवर्षीय योजनाओं के चार मुख्य दीर्घकालिक लक्ष्य थे:
1. संवृद्धि (Growth):
- इसका अर्थ है देश की वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन की क्षमता में वृद्धि करना।
- इसे मुख्य रूप से सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में निरंतर वृद्धि के रूप में मापा जाता है।
- संवृद्धि के लिए अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों (कृषि, उद्योग, सेवाएँ) का विकास आवश्यक है।
2. आधुनिकीकरण (Modernisation):
- इसका अर्थ है वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन को बढ़ाने के लिए नई तकनीक (New Technology) को अपनाना। (जैसे कृषि में नई बीज किस्मों का उपयोग, उद्योगों में नई मशीनों का उपयोग)।
- आधुनिकीकरण में सामाजिक दृष्टिकोण (Social Outlook) में बदलाव भी शामिल है, जैसे महिलाओं को समान अधिकार देना और समाज में उनकी भागीदारी बढ़ाना।
3. आत्मनिर्भरता (Self-Reliance):
- शुरुआती पंचवर्षीय योजनाओं ने ‘आत्मनिर्भरता’ पर बहुत जोर दिया।
- इसका अर्थ है आर्थिक विकास के लिए घरेलू संसाधनों पर निर्भर रहना और विदेशी निर्भरता (विशेषकर विदेशी सहायता और आयात) को कम करना।
- आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution): उन वस्तुओं का घरेलू उत्पादन करना जिन्हें पहले आयात किया जाता था, ताकि विदेशी मुद्रा बचाई जा सके और विदेशी हस्तक्षेप से बचा जा सके।
4. समानता (Equity):
- केवल आर्थिक संवृद्धि पर्याप्त नहीं है, यदि उसका लाभ केवल कुछ ही लोगों को मिले।
- समानता का अर्थ है यह सुनिश्चित करना कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों (विशेषकर गरीबों) तक पहुँचे।
- इसका उद्देश्य आय और संपत्ति की असमानता को कम करना और सभी के लिए भोजन, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करना है।
विकास की रणनीतियाँ (Strategies of Development – 1950 से 1990 तक)
इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, भारत ने शुरुआती चार दशकों (1950-1990) में एक विशिष्ट रणनीति अपनाई:
1. सार्वजनिक क्षेत्र पर भारी निर्भरता (Heavy Reliance on Public Sector):
- सरकार ने औद्योगीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास में प्रमुख भूमिका निभाई।
- भारी और बुनियादी उद्योगों (जैसे लोहा और इस्पात, बिजली, मशीनरी) की स्थापना सरकार (सार्वजनिक क्षेत्र) द्वारा की गई।
2. औद्योगिक विकास (Industrial Development):
- दूसरी पंचवर्षीय योजना (महालानोबिस मॉडल) से भारी और बुनियादी उद्योगों के तेजी से विकास पर जोर दिया गया।
- यह माना गया कि एक मजबूत औद्योगिक आधार ही दीर्घकालिक आर्थिक विकास का इंजन बन सकता है।
3. आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution) की व्यापार नीति:
- यह रणनीति घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने पर केंद्रित थी।
- आयात को हतोत्साहित करने के लिए आयात पर भारी शुल्क (Tariffs) लगाए गए और आयात की मात्रा तय करने के लिए कोटा (Quotas) निर्धारित किया गया।
- उद्देश्य देश के भीतर ही वस्तुओं का उत्पादन करना और विदेशी मुद्रा को बचाना था।
4. निजी क्षेत्र पर सख्त नियंत्रण (Strict Control on Private Sector):
- निजी क्षेत्र को विनियमित करने के लिए लाइसेंसिंग प्रणाली (Licence Raj) लागू की गई।
- कोई भी नया व्यवसाय शुरू करने या मौजूदा व्यवसाय का विस्तार करने के लिए सरकार से लाइसेंस लेना आवश्यक था।
5. कृषि और भूमि सुधार (Agriculture and Land Reforms):
- कृषि में उत्पादकता बढ़ाने और समानता लाने के लिए भूमि सुधार (जैसे ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन, भूमि की अधिकतम सीमा तय करना) लागू किए गए।
- बाद में (1960 के दशक के मध्य में), कृषि उत्पादन को तेजी से बढ़ाने के लिए ‘हरित क्रांति’ (Green Revolution) की रणनीति अपनाई गई, जिसमें उच्च उपज वाले बीजों (HYV), उर्वरकों और सिंचाई का उपयोग शामिल था।
संक्षेप में: स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था शोषणकारी ब्रिटिश नीतियों के कारण अत्यंत पिछड़ी हुई थी। इस स्थिति से उबरने के लिए भारत ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से विकास का मार्ग चुना, जिसका उद्देश्य संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता और समानता प्राप्त करना था। शुरुआती रणनीति में सार्वजनिक क्षेत्र की प्रधानता और आयात प्रतिस्थापन पर ज़ोर दिया गया था।